जनेऊँ के अंतिम अक्षर ऊँ अर्थात् आध्यात्म से श्री चन्द्रमोहन जी ने अपने अभियान की शुरूआत की और अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों से समाज का परिचय कराया। समाज में फैली रूढ़िवादी विचारधारा से हटकर वास्तविक अध्यात्म से सभी को परिचित कराया गया। जहां उन्होंने आध्यात्म के सम्बन्ध में अपना पहला उद्घोष दिया – "अपने बनाये मंदिर में बहुत जा चुके अब परमात्मा के बनाये मंदिर (स्वयं का शरीर) में भी जाना सीखो।" उनके इस उद्घोष ने आध्यात्मिक क्षेत्र में एक क्रांति सी ला दी और उनके सहयोगियों की संख्या बढ़ने लगी। क्रांतिगुरू श्री चन्द्रमोहन जी के द्वारा परमात्मा की सच्ची पूजा सिखायी गयी जिसका मात्र 15 दिनों के भीतर मन, बुद्धि व शरीर पर कल्याणकारी प्रभाव दिखना शुरू हो जाता है।
जनेऊँ के मध्यम अक्षर ने अर्थात् नैतिकता का अर्थ बताया- श्री चन्द्रमोहन जी क्रांतिकारियों को अपना भगवान मानते हैं। वे कहते हैं कि "क्रांतिकारी मेरे भगवान हैं। मैं उनके सपने और सम्मान के लिये कुछ भी कर दूंगा। ये मेरी प्रतिज्ञा है।" उनके इस उद्घोष ने आध्यात्मिक क्षेत्र में एक क्रांति सी ला दी और उनके सहयोगियों की संख्या बढ़ने लगी। क्रांतिगुरू श्री चन्द्रमोहन जी के द्वारा परमात्मा की सच्ची पूजा सिखायी गयी जिसका मात्र 15 दिनों के भीतर मन, बुद्धि व शरीर पर कल्याणकारी प्रभाव दिखना शुरू हो जाता है।
जनेऊँ के पहले अक्षर ज अर्थात् जनता के लिये कार्य करने का अर्थ बताया- हमारे हिन्दुस्तान में 70% से ज्यादा युवा हैं लेकिन नशे ने हमारी युवा पीढ़ी को बर्बाद किया हुआ है। इसके लिये उन्होंने वास्तविक आध्यात्म के परिचय के साथ-साथ नशे व जातिरहित समाज के लिये शंखनाद किया और उद्घोष दिये – "नशे का नाश हो, जाति व्यवस्था का सत्यानाश हो।" उन्होंने युवाओं को जागरूक किया और चाय तक के नशे से दूर रहने की शपथ दिलाई। श्री चन्द्रमोहन जी ने युवाओं को बताया कि नशा करना और जाति को मानना वास्तव में क्रांतिकारियों के प्रति गद्दारी है। जो युवा नशा करता है या जाति को मानता है वो वास्तव में क्रांतिकारियों का अपमान करता है। नशे के बाद हमारा देश सबसे ज्यादा जिस बीमारी से ग्रस्त है वो है जाति व्यवस्था। इसलिये देश के इस रोग पर बड़ी चोट की और कहा – "हे! जाति के मानने वालों परमात्मा तुमसे बहुत दूर है।" ये उद्घोष केवल बोले ही नहीं गये अपितु गांव-गांव में दीवारों पर लिखवाये गये। जिस कारण जाति के ठेकेदारों की नींव हिल गयी। वे श्री चन्द्रमोहन जी को धमकी भरे पत्र भेजने लगे कि ‘‘इस अभियान को बंद कर दो और यहां से चले जाओ वरना अंजाम बुरा होगा।’’ परन्तु जब कोई किसी बुराई को जड़ से खत्म करने के लिये ठान लेता है तो वो इन धमकियों से नहीं डरता। वे भी निडर होकर अपने अभियान में लगे रहे।