श्री चन्द्रमोहन जी का जन्म सन् 1968 में आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को देवभूमि उत्तराखण्ड के पौढ़ी जिले के मंजकोट ग्राम में माता श्रीमति लीलावती जी व पिता गजेन्द प्रसाद जी के यहां हुआ। जन्म के 41वें दिन उनके गुरू श्री आनंदकंद जी महाराज ने उनका नामकरण किया चन्द्रमोहन।
श्री चन्द्रमोहन जी बचपन से ही जाति व्यवस्था से घोर घृणा करते थे। उनके गुरू श्री आनंदकंद जी के निर्देश से उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया व जाति व्यवस्था के कुरूप चेहरे को जाना तब उन्होंने इस जाति व्यवस्था को हिंदुस्तान से उखाड़ फेकने का निर्णय लिया।
मारा शरीर अर्थात् मनुष्य शरीर परमात्मा द्वारा बनाया गया सच्चा मन्दिर है। मनुष्य के इस पांच-छः फुट के शरीर में बहुत अद्भुत रहस्य छिपे हुए हैं जिनका पता हमें अन्तः पूजा से चलता है।......
हम प्रायः यह कहते व सुनते हैं कि रामराज लाएंगे, रामराज आयेगा परन्तु जिस राम के राज को लाने की हम बात करते हैं वास्तव में हम उस राम के रहस्य को ही नहीं जान पाये।...
अध्यात्म से ही अमृत की प्राप्ति होती है। अमृत प्राप्त करने के लिए ही अध्यात्म में प्रवेश किया जाता है। अमृत प्राप्त करने के बाद और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता ...
परमात्मा ने मनुष्य को अध्यात्म के बड़े ही गूढ़ रहस्यों के साथ धरती पर उतारा है। देवतागण भी मनुष्य योनि पाने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। ग्रन्थों में भी कहा गया-सुर दुलर्भ मानुष तन पावा।केवल मनुष्य योनि मिलने पर ही परमात्मा...